सोमवार, 7 मार्च 2016

JNU, कन्हैया और देश

नमस्कार मित्रो यह मेरा प्रथम ब्लॉग है अब तक सिर्फ सोशल नेटवर्किंग साइट्स, समाचार पत्रो और न्यूज़ पर बहस के दौरान ही वाद-विवाद देखा और सुना किन्तु वर्तमान कुछ समय की प्रमुख घटनाओ में JNU मुद्दा काफी गरमाया है।
शुरुआत होती है 9 फरवरी की रात को लगाये गए देश विरोधी नारो से जैसा कि 7 videos में दिखाया गया है। इन videos को देखते अवश्य ही हर भारतीय का खून खोल उठेगा काफी आपत्तिजनक नारे लगाये गए।
कन्हैया जो कि काफी चर्चित चेहरा बन चूका है, उसे गिरफ्तार किया जाता है उसके कुछ साथी फरार हो जाते है, फिर आत्मसमर्पण करते है। सब कुछ मानो नाटकीय ढंग से होता है या यूँ कहिये एक प्रचलित प्रथा के जेसे पहले फरार फिर सरेंडर। 
कन्हैया को पेशी के दौरान पीटा जाता है उसकी जुबान काटकर लाने वाले को 5 लाख का ईनाम, गोली मारने वाले को पूर्वांचल सेना के मुखिया की तरफ से 11 लाख का ईनाम देने की खोखली घोषणा ताकि वो भी JNU नामक व्यंजन में थोडा नमक छिड़क दे। और अब फ़िलहाल कन्हैया 6 महीने की सशर्त जमानत पर बाहर है। उसके बाद उसका JNU कैम्पस में भाषण काफी चर्चा में है। राजनीतिक गलियारों में इसकी काफी गूँज सुनाई दे रही है केंद्र सरकार के मुताबिक़ जहाँ वह देशद्रोही गतिविधियों में लिप्त है तो वही बाकी की पार्टियों में विशेषकर केजरीवाल के आँखों का तारा बने हुए है इसी बहाने केजरीवाल ने केंद्र से आज़ादी की मांग की है।
                                अंततः यदि विश्लेषण करे तो JNU में हुए घटनाक्रम पर नज़र डाले तो यह स्पष्ट है की कन्हैया कुमार कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रेरित है साथ ही दलितों, पिछड़ो के हक़ के लिए आंदोलित है किन्तु जो तरीका वो अपना रहे है उससे राष्ट्रविरोधी ताकतों को बल मिल रहा है। 
भारत कभी भी आतंकवाद का समर्थन नहीं करता है किन्तु ऐसे कार्यक्रमों से न सिर्फ अफज़ल गुरु जैसे आंतकवादी की विचारधारा रखने वाले लोगो को बल मिलता है बल्कि कश्मीर के कुछ लोग विशेषकर अलगाववादी इस स्थिति का लाभ उठाना चाहते है। साथ ही विश्व पटल पर भारत की छवि को धूमिल भी किया जा रहा है।
                               यदि कन्हैया कुमार को हम नज़रन्दाज़ करेंगे तो ये भी ठीक नहीं है किन्तु देश की एकता और अखण्डता को खंडित करने की कोशिश करने वाले न केवल संवैधानिक तौर पर देशद्रोही होंगे बल्कि आम जनता भी आक्रोशित होकर, हो सकता है ऐसे लोगो की हत्या करने पर उतारू हो जाये।
                                 हमे कन्हैया जैसे विद्यार्थियो को साथ लेकर विचार विमर्श की आवश्यकता है। समुचित वाद-विवाद की आवश्यकता है ताकि ये तो पता चले हमारा युवा हमसे क्या उम्मीद रखता है उसकी देश के प्रति सोच और आकांक्षा क्या है? क्योंकि जिसे जेल में डालेंगे वो भी हमारा ही होगा जिसे फाँसी देंगे वो भी अपना ही होगा किन्तु राष्ट्र से बढ़कर कुछ भी नही और अंततः सार यही है  हम कन्हैया को, यदि स्वीकार नहीं सकते तो नकार भी नहीं सकते।
यह एक प्रश्न भी है और उत्तर भी।
धन्यवाद ब्लॉग को काफी ध्यानपूर्वक पढ़ने के लिए आप और मैं मिलकर हम होंगे भारतवर्ष को हम की ही आवश्यकता है। 
यदि कोई कमी या किसी जानकारी का इस ब्लॉग में अभाव हे तो आप मुझे मेल कर सकते है।
जय हिन्द जय भारत।
आपका अपना
रचित

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